जेनरिक और ब्रांडेड दवा का अंतर: सस्ती दवा महंगी दवा की सच्चाई

नई दिल्ली। 

मेडिकल स्टोर पर दवा लेते समय अक्सर मरीज के सामने एक सीधा लेकिन उलझन भरा सवाल खड़ा हो जाता है 
“डॉक्टर ने जो ब्रांड लिखा है, वही लें या जेनरिक दवा भी उतनी ही असरदार है।

यह सवाल केवल पैसों का नहीं है, बल्कि भरोसे, जानकारी और स्वास्थ्य सुरक्षा से जुड़ा हुआ है। फार्मास्यूटिकल्स की दुनिया में जेनरिक और ब्रांडेड दवाएं दो अलग-अलग श्रेणियाँ हैं, जिनका उद्देश्य भले ही एक ही हो मरीज को राहत देना लेकिन उनकी तैयारी, कीमत और बाजार रणनीति में बड़ा अंतर होता है।

स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि इन दोनों के बीच अंतर को समझना न केवल मरीजों के लिए, बल्कि डॉक्टरों और फार्मासिस्टों के लिए भी जरूरी है, ताकि इलाज को किफायती और प्रभावी बनाया जा सके।

क्या होती हैं ब्रांडेड दवाएं?

ब्रांडेड दवाएं वे फार्मास्यूटिकल उत्पाद होती हैं, जिन्हें कोई कंपनी पहली बार खोजती, विकसित करती और बाजार में उतारती है। इन्हें Innovator Medicines भी कहा जाता है।

इन दवाओं के पीछे वर्षों की मेहनत होती है:

  • नई दवा की खोज

  • लैब में रिसर्च

  • प्रीक्लिनिकल स्टडी

  • इंसानों पर चरणबद्ध क्लिनिकल ट्रायल

  • और फिर सरकारी मंजूरी

एक नई ब्रांडेड दवा को बाजार तक पहुँचने में आमतौर पर 10 से 15 साल लग जाते हैं। इस पूरी प्रक्रिया में भारी निवेश होता है, जिसका असर अंततः दवा की कीमत पर पड़ता है।

ब्रांडेड दवाओं की प्रमुख विशेषताएँ

1. रिसर्च एंड डेवलपमेंट 

फार्मास्यूटिकल कंपनियाँ नई दवाओं के लिए रिसर्च एंड डेवलपमेंट में अरबों रुपये खर्च करती हैं। इसमें संभावित दवा अणुओं की पहचान, सुरक्षा परीक्षण और प्रभावकारिता का मूल्यांकन शामिल होता है।

2. क्लिनिकल परीक्षण

ब्रांडेड दवाओं को उपयोग की अनुमति मिलने से पहले मानव प्रतिभागियों पर कई चरणों में परीक्षण से गुजरना पड़ता है। इन परीक्षणों का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना होता है कि दवा:

  • सुरक्षित है

  • प्रभावी है

  • और सही खुराक में काम करती है

3. पेटेंट संरक्षण

सफल परीक्षणों के बाद कंपनी को पेटेंट मिलता है, जो आमतौर पर करीब 20 वर्षों तक मान्य रहता है। इस दौरान केवल वही कंपनी उस दवा का उत्पादन और बिक्री कर सकती है। यह पेटेंट कंपनियों को रिसर्च की लागत वसूलने का अवसर देता है।

4. उच्च लागत

रिसर्च, क्लिनिकल ट्रायल और मार्केटिंग पर होने वाले खर्च के कारण ब्रांडेड दवाएं महंगी होती हैं। मरीज इन खर्चों का भार कीमत के रूप में चुकाते हैं।

5. ब्रांड पहचान

ब्रांडेड दवाओं के नाम, पैकेजिंग और रंग अलग-अलग होते हैं। यह पहचान मरीजों को दवा याद रखने में मदद करती है, लेकिन कीमत बढ़ाने में भी भूमिका निभाती है।

जेनरिक दवाएं क्या हैं?

जेनरिक दवाएं तब बाजार में आती हैं जब किसी ब्रांडेड दवा का पेटेंट समाप्त हो जाता है। इसके बाद अन्य कंपनियाँ उसी दवा को उसके साल्ट नेम से बना सकती हैं।

जेनरिक दवाओं में:

  • वही Active Ingredient

  • वही Strength

  • वही Dosage Form

  • और वही Therapeutic Effect

होता है।

यानी दवा का असर वही रहता है, सिर्फ नाम और पैकेजिंग बदल जाती है।

जेनरिक दवाएं सस्ती क्यों होती हैं?

जेनरिक दवाओं के निर्माता:

  • नई रिसर्च पर खर्च नहीं करते

  • बड़े क्लिनिकल ट्रायल दोबारा नहीं करते

  • सीमित मार्केटिंग करते हैं

इसी वजह से जेनरिक दवाएं 30 से 90 प्रतिशत तक सस्ती हो सकती हैं। यह कीमत का फर्क गुणवत्ता का नहीं, बल्कि व्यवसायिक मॉडल का परिणाम है।

क्या जेनरिक दवाएं सुरक्षित और असरदार हैं?

यह सवाल सबसे ज्यादा पूछा जाता है।

दवा नियामक संस्थाएं स्पष्ट कहती हैं कि जेनरिक दवाओं को बायोइक्विवेलेंस साबित करना होता है। इसका मतलब है कि जेनरिक दवा शरीर में उसी तरह काम करे जैसी ब्रांडेड दवा।

विश्व स्वास्थ्य संगठन और Food and Drug Administration के अनुसार, यदि जेनरिक दवा बायोइक्विवेलेंट है, तो उसका चिकित्सीय प्रभाव ब्रांडेड दवा के बराबर माना जाता है।

हाँ, रंग या आकार अलग हो सकता है, लेकिन असर में फर्क नहीं होना चाहिए।

फिर जेनरिक दवाओं को लेकर डर क्यों?

स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि यह डर मुख्य रूप से:

  • अधूरी जानकारी

  • वर्षों से बनी मानसिकता

  • और “महंगी दवा ही बेहतर” वाली सोच

से पैदा होता है।

यह ठीक वैसा ही है जैसे यह मान लेना कि महंगी घड़ी ही सही समय बताएगी, जबकि समय तो हर घड़ी एक जैसा ही दिखाती है।

क्या ब्रांडेड से जेनरिक पर स्विच करना सुरक्षित है?

अधिकांश मामलों में हाँ

स्वास्थ्य विशेषज्ञों की सलाह और निगरानी में मरीज ब्रांडेड दवा से जेनरिक दवा पर स्विच कर सकता है। चूंकि जेनरिक दवाएं बायोइक्विवेलेंट होती हैं, इसलिए उनका चिकित्सीय प्रभाव भी तुलनीय होता है।

हालांकि, कुछ विशेष स्थितियों में डॉक्टर ब्रांडेड दवा ही जारी रखने की सलाह देते हैं। इसलिए दवा बदलने से पहले डॉक्टर या फार्मासिस्ट से परामर्श जरूरी है।

जेनरिक और ब्रांडेड दवाओं के बीच अंतर समझना आज के समय में बेहद जरूरी हो गया है। ब्रांडेड दवाएं इनोवेशन और रिसर्च का परिणाम हैं, जबकि जेनरिक दवाएं उसी विज्ञान को आम आदमी के बजट में उपलब्ध कराती हैं।

स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि सही जानकारी के साथ लिया गया फैसला न केवल इलाज को बेहतर बनाता है, बल्कि मरीज पर आर्थिक बोझ भी कम करता है।

दवा का असर उसके नाम से नहीं, उसके विज्ञान से तय होता है।

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